12th Hindi Poem अध्याय – 4. छप्पय (कवि का परिचय) subjective

 12th Hindi Poem अध्याय – 4. छप्पय (कवि का परिचय) subjective

कवि से संबंधित प्रश्नोत्तर (Questions & Answers about the Poet)

प्रश्न 1: 'छप्पय' शीर्षक पाठ के कवि कौन हैं?

  • उत्तर: इस पाठ के कवि नाभादास हैं।

प्रश्न 2: कवि नाभादास का मूल नाम क्या था?

  • उत्तर: उनका मूल नाम नारायण दास था।

प्रश्न 3: नाभादास का जन्म कब और कहाँ हुआ था?

  • उत्तर: उनका जन्म अनुमानित रूप से 1570 में दक्षिण भारत में हुआ था।

प्रश्न 4: नाभादास का निधन कब और कहाँ हुआ था?

  • उत्तर: उनका निधन अज्ञात है (अनुमानतः 1600 तक वर्तमान) और निधन स्थान अयोध्या या चित्रकूट (अनुमानित) माना जाता है।

प्रश्न 5: नाभादास की शिक्षा दीक्षा कैसे हुई?

  • उत्तर: उन्होंने अपने प्रतिपालक गुरु की देख-रेख में स्वाध्याय और सत्संग द्वारा ज्ञानार्जन किया।

प्रश्न 6: नाभादास के दीक्षागुरु कौन थे?

  • उत्तर: उनके दीक्षागुरु स्वामी अग्रदास (अग्रअली) थे, जो स्वयं 'स्वामी रामानंद' के शिष्य थे।

प्रश्न 7: नाभादास का स्थाई निवास कहाँ था?

  • उत्तर: उनका स्थाई निवास वृंदावन था।

प्रश्न 8: नाभादास की अभिरुचि किन चीजों में थी?

  • उत्तर: नाभादास की अभिरुचि लोकभ्रमण, भगवद्भक्ति, काव्य रचना और वैष्णव दर्शन-चिंतन में विशेष रूप से थी।

प्रश्न 9: नाभादास के समकालीन कवि कौन थे?

  • उत्तर: वे गोस्वामी तुलसीदास के समकालीन थे।

प्रश्न 10: नाभादास की प्रमुख कृतियाँ (रचनाएँ) कौन सी हैं?

  • उत्तर: नाभादास की प्रमुख कृतियाँ निम्न हैं:

  • भक्तमाल (रचनाकाल: 1585-1596)

  • अष्टयाम – यह ब्रजभाषा गद्य रूप में लिखित है। इसे रामचरितमानस की दोहा-चौपाई शैली में लिखा गया है।

महत्वपूर्ण जानकारी (Important Study Points)

प्रश्न : नाभादास के बचपन और माता-पिता के संबंध में क्या जानकारी मिलती है?

  • उत्तर: जब नाभादास शैशव अवस्था (बचपन) में थे, तभी उनके पिताजी की मृत्यु हो गई थी। बाद में, घर में अकाल पड़ने के कारण उनकी माताजी उन्हें लेकर जयपुर (राजस्थान) आ गईं, लेकिन दुर्भाग्यवश वे अपनी माताजी से भी बिछड़ गए।

प्रश्न : नाभादास किस धारा के कवि और वैष्णव थे?

  • उत्तर: नाभादास सगुणोपासक रामभक्त कवि और एक सच्चे वैष्णव थे।

प्रश्न : नाभादास की सबसे अधिक जगत प्रसिद्ध कृति कौन सी है?

  • उत्तर: उनकी सबसे प्रसिद्ध कृति 'भक्तमाल' है।

प्रश्न 'भक्तमाल' का क्या अर्थ है और इसमें किसका वर्णन है?

  • उत्तर: 'भक्तमाल' का अर्थ "भक्त चरित्रों की माला" है। इसमें नाभादास के पूर्ववर्ती और समवर्ती वैष्णव भक्तों के चरित वर्णित हैं।

प्रश्न : विद्वानों के मुताबिक नाभादास किस वर्ग के थे?

  • उत्तर: विद्वानों के अनुसार नाभादास दलित वर्ग के थे।

प्रश्न संपूर्ण 'भक्तमाल' किस छंद में निबद्ध है?

  • उत्तर: संपूर्ण 'भक्तमाल' छप्पय छंद में निबद्ध है।

प्रश्न : 'छप्पय' क्या है और इसकी विशेषता क्या है?

  • उत्तर: छप्पय एक छंद है जो छह (6) पंक्तियों का गेय पद होता है।

प्रश्न 'भक्तमाल' में कितने छप्पय और कितने भक्तों का चरित्र वर्णन है?

  • उत्तर: इसमें 316 छप्पयों में 200 भक्तों के चरित वर्णित हैं।

प्रश्न - पाठ्यपुस्तक में संकलित छप्पय कहाँ से लिए गए हैं?

  • उत्तर: कबीर और सूरदास पर लिखे गए छप्पय 'भक्तमाल' से संकलित हैं।

कबीर दास से संबंधित पद एवं अर्थ (Verses on Kabir & Meanings)

पद 1:

भगति विमुख जे धर्म सो, सब अधर्म करि गए।

योग यज्ञ व्रत दान भजन बिनु तुच्छ दिखाए।।

उपर्युक्त पंक्तियों का क्या अर्थ है?

  • उत्तर: बिना भक्ति के किया गया धर्म भी अधर्म के समान है। योग, यज्ञ, व्रत, दान आदि सभी कर्म, ईश्वर के भजन के बिना तुच्छ (महत्वहीन) के समान हैं।

पद 2:

हिन्दू तुरक प्रमान रमैनी सबदी साखी।

पक्षपात नहिं बचन सबहिके हितकी भाषी।।

पंक्तियों के माध्यम से कबीर दास के बारे में क्या कहा गया है?

  • उत्तर: कबीर दास जी ने कभी किसी के साथ पक्षपात नहीं किया। उनके वचन और भाषा हमेशा सभी के हित (भले) के लिए होते थे, चाहे वह हिंदू हो या मुस्लिम। इसका साक्ष्य उनकी 'रमैनी' और 'सबदी' जैसी रचनाओं (ग्रंथों) में मिलता है।

प्रश्न

आरूढ़ दशा है जगत पै मुख देखी नाहीं बानी।

कबीर कानि राखी नहीं वर्णाश्रम षट दर्शनी।।

कबीर ने समाज के किन बंधनों और कुरीतियों का खंडन किया?

  • उत्तर: संसार के सभी लोगों की एक ही दशा है कि वे मुख देखकर (दिखावा या पक्षपात देखकर) ही अच्छा-बुरा कहते हैं। परंतु कबीर ने कभी ऐसा नहीं कहा और न ही कभी सुनि-सुनाई बातों पर विश्वास किया। उन्होंने चार वर्ण, चार आश्रम और छह दर्शनों को भी विशेष महत्व नहीं दिया (अर्थात वे इनसे ऊपर उठकर सत्य की बात करते थे)।

प्रश्न : कबीर के पद में वर्णित 'चार वर्ण', 'चार आश्रम' और 'छह दर्शन' कौन-कौन से हैं?

  • उत्तर:

  • चार वर्ण: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र।

  • चार आश्रम: ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास।

  • छ: दर्शन: सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदांत।

सूरदास से संबंधित पद (Verses on Surdas)

पद:

उक्ति चौज अनुप्रास वर्ण स्थिति अतिभारी।

वचन प्रीति निरवही अर्थ अद्भुत तुकधारी।।

पदों के अर्थ एवं व्याख्या (Verses & Meanings)

पद 1:

उक्ति चौज अनुप्रास वर्ण स्थिति अतिभारी। वचन प्रीति निरवही अर्थ अद्भुत तुकधारी।।

  • अर्थ- सूरदास की रचनाएँ सभी युक्ति, चमत्कार और अनुप्रास वर्ण के स्थिति से भरी है। उनके वचन और वाणी प्रेम से भरी है उनके अर्थ अद्भुत है और एक तुक को धारण किए हुए हैं।

  • अनुप्रास वर्ण- जिस पंक्ति में वर्ण या वर्णों का समूह बार-बार आता है उसे अनुप्रास कहते है।

पद 2:

प्रतिबिंबित दिवि दृष्टि हृदय हरि लीला भासी। जन्म कर्म गुन रूप सबहि रसना परकासी।।

  • अर्थ- सूरदास ने अपने दिव्य दृष्टि से अपने हृदय में हरि का एक प्रतिबिंब बनाया है और उनके लीला का वर्णन किया है उन्होंने श्रीकृष्ण के जन्म, कर्म, गुण और रूप का वर्णन अपने वचनों द्वारा अपने कविताओं में किये है।

पद 3:

विमल बुद्धि हो तासुकी, जो यह गुन श्रवनिन्ह धरै। सूर कवित सुनि कौन कवि, जो नहिं शिरचालन करै।।

  • अर्थ- जो सूरदास की रचनाओं को उनके गुणों को अपने कानों से सुनता है उसकी बुद्धि निर्मल हो जाती है। उनकी कविताओं को सुनकर कोई भी गलत नहीं कह सकता सभी अपना सिर हाँ में हिलाते हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न – 5 अंक (Long Answer Questions)

प्रश्न 1. 'छप्पय' कविता का सारांश लिखें।

  • उत्तर- 'छप्पय' कविता नाभादास के द्वारा रचित है। नाभादास सगुण उपासक रामभक्त कवि थे उनकी भक्ति राम भक्ति से थोड़ी भिन्न थी। क्योंकि उनमें मर्यादा के स्थान पर माधुर्यभाव का पुट भरा था। नाभादास एक सूफी कवि थे। इस कविता में दो छप्पय हैं जो कबीर और सूरदास पर लिखे गए हैं इसे भक्तमाल से लिया गया है। भक्तमाल का अर्थ है - "भक्त चरित्रों की माला"। छप्पय एक छंद है जो छ: पंक्तियों का गेय पद होता है।

  • 👉 प्रथम छप्पय में कहा गया है कि बिना भक्ति के धर्म भी अधर्म के समान है। योग, यज्ञ, व्रत, दान सभी भजन के बिना व्यर्थ है। कबीर जी ने कभी किसी के साथ पक्षपात नहीं किये चाहे वह हिन्दू हो या मुस्लिम। उन्होंने कभी सुनी-सुनाई बातों पर विश्वास नहीं किया। उन्होंने तो चार वर्ण, चार आश्रय और छ: दर्शनों को भी महत्व नहीं दिया।

  • 👉 द्वितीय छप्पय में कहा गया है कि सूरदास की रचनाएँ युक्ति, चमत्कार और अनुप्रास वर्ण से भरी पुरी है। उनका वचन और वाणी प्रेम रस से भरी होती है। उन्होंने श्रीकृष्ण के जन्म, कर्म, गुण, रूप आदि का वर्णन अपने कविताओं में किये हैं। उनकी कविता को सुनकर सभी आनन्दित हो जाते हैं।

सप्रसंग व्याख्यात्मक प्रश्न – 4 अंक (Explanation Questions)

प्रश्न 1. सूर कवित सुनि कौन कवि, जो नहीं शिरचालन करै। सप्रसंग व्याख्यात्मक करें

  • उत्तर- प्रस्तुत पंक्ति नाभादास रचित 'छप्पय' शीर्षक कविता से लिया गया है। जो भक्तमाल से संकलित है। छप्पय एक छन्द है जो छ: पंक्तियों का गेय पद होता है। इस पंक्ति के माध्यम से कवि का कहना है कि जो सूरदास के कविताओं को और उनके गुणों को सुनता है वह कभी भी सूर के बारे में गलत नहीं कहता बल्कि सभी अपना सिर झुकाकर हाँ भरते है उन्हें नमन करते हैं।

प्रश्न 2. भगति विमुख जे धर्म सो सब अधर्म करि गए।

सप्रसंग व्याख्यात्मक करें

  • उत्तर- प्रस्तुत पंक्ति नाभादास रचित 'छप्पय' शीर्षक कविता से लिया गया है। जो भक्तमाल से संकलित है। छप्पय एक छन्द है जो छ: पंक्तियों का गेय पद होता है। इस पंक्ति के माध्यम से कवि का कहना है “बिना भक्ति के धर्म भी अधर्म के समान है। योग, यज्ञ, व्रत, दान सब भजन के बिना तुच्छ है।

लघु उत्तरीय प्रश्न – 2 अंक (Short Answer Questions)

प्रश्न 1. नाभादास ने, छप्पय में कबीर के किन विशेषताओं का उल्लेख किया है?

  • उत्तर- नाभादास ने अपने छप्पय में कबीर के उन विशेषताओं का उल्लेख किया है जो सभी धर्मों के लोगों के हित में है। चाहे वह हिन्दू हो या मुस्लिम कबीर जी ने कभी किसी के साथ पक्षपात बाते नहीं किये वे मूंह देखी और सुनी-सुनाई बातों पर विश्वास नहीं कियें। सदा लोगों के कल्याण की बाते की।

प्रश्न 2. 'मुख देखी नाहीं भनी' का क्या अर्थ है? कबीर पर यह कैसे लागू होता है?

  • उत्तर- नाभादास जी अपने छप्पय कविता में कबीर जी के बारे में कहते है कि उन्होने कभी भी मुँह देखी और सुनी-सुनाई बातों पर विश्वास नहीं किया। वे सदा लोगों के हित जनक बाते कहें हैं।

प्रश्न 3. सूर के काव्य की किन विशेषताओं का उल्लेख कवि ने किया है?

  • उत्तर- नाभादास जी ने अपने 'छप्पय' कविता में सूरदास जी के उन विशेषताओं का उल्लेख किया है जिसे सुनकर और पढ़कर हम सभी उन्हें नमन करेंगे। नाभादास कहते है कि सूर के रचनाओं में युक्ति चमत्कार और प्रेम रस भरा होता है। जो सभी पाठक को आनन्दित कर देता है।

प्रश्न 4. 'पक्षपात नहीं वचन सबहि के हित की भाषी?' इस पंक्ति में कबीर के किस गुण का परिचय दिया गया है?

  • उत्तर- नाभादास जी इस पंक्ति के माध्यम से कबीर जी के बारे में परिचय देते हुए कहते हैं कि कबीर कभी किसी के साथ पक्षपात नहीं किये। उनके वचन और भाषा सभी धर्मों के लोगों के हित में होते है। वे सदा सभी लोगों का कल्याण चाहते हैं।

प्रश्न 5. कविता में तुक का क्या महत्व है? इन छप्पयों के संदर्भ में स्पष्ट करें

  • उत्तर- तुक का तात्पर्य समान वर्ण अथवा समान ध्वनि का अन्त में प्रयोग से होता है। अर्थात् कबीर की कविताओं की पंक्तियाँ लययुक्त होती है जिसे सुनने में एवं पढ़ने में बहुत आनंद आता है।

प्रश्न 6. 'कबीर कानि राखी नहीं' से क्या तात्पर्य है?

  • उत्तर- इस पंक्ति का तात्पर्य यह है कि कबीर जी किसी के सुनी-सुनाई बातों पर विश्वास नहीं करते हैं। उन्होंने तो वर्णाक्ष वर्णाश्रम को भी नहीं माना है।

प्रश्न 7. कबीर ने भक्ति को कितना महत्व दिया?

  • उत्तर- कबीर ने भक्ति को अत्यधिक महत्व दिया है। भक्ति के बिना सारे धर्मों को अधर्म माना है। अर्थात् भक्ति ही जीवन का सार है।



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