Sociology Chapter 6 Part 1 विविधता में एकता की चुनौतियां subjective
1. जातिवाद सामाजिक एकता में बाधक है। कैसे?
उत्तर:- जातिवाद का अर्थ है जब कोई व्यक्ति अपनी जाति को सबसे अच्छा मानता है और दूसरी जातियों को छोटा समझता है। इस संकुचित सोच के कारण लोग एक-दूसरे से भेदभाव करने लगते हैं, जिससे समाज में नफरत और आपसी झगड़े बढ़ते हैं।
जातिवाद लोगों के बीच प्रेम, सहयोग और भाईचारे की मानवीय भावना को खत्म कर देता है।
राजनेता या कुछ लोग अपने निजी लाभ (सत्ता या पैसा हासिल करने) के लिए जातिवाद को बढ़ावा देते हैं।
यह व्यवस्था समाज को बाँटती है और लोगों को एकजुट होने से रोकती है, यही मुख्य कारण है कि जातिवाद सामाजिक एकता में सबसे बड़ी बाधा माना जाता है।
2. पितृसत्ता का क्या अर्थ है?
उत्तर:- पितृसत्ता का तात्पर्य एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था से है जहाँ घर और समाज में पुरुषों को महिलाओं की तुलना में अधिक अधिकार और मान-सम्मान दिया जाता है।
ऐसे समाज में ज्यादातर महत्वपूर्ण फैसले पुरुषों द्वारा लिए जाते हैं और महिलाओं को उनके निर्देशों के अनुसार चलना पड़ता है।
इस व्यवस्था में परिवार की पहचान और वंश का नाम पिता के नाम से ही जुड़ा होता है।
3. साम्प्रदायिकता के दुष्परिणामों पर प्रकाश डालें।
उत्तर:- साम्प्रदायिकता तब उत्पन्न होती है जब लोग अपने धर्म को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं और दूसरे धर्मों के अनुयायियों के प्रति नफरत या भेदभाव का भाव रखते हैं। इससे समाज और देश दोनों का भारी नुकसान होता है।
साम्प्रदायिकता के मुख्य दुष्परिणाम निम्नलिखित हैं:
साम्प्रदायिक दंगे: साम्प्रदायिकता के कारण लोग आपस में लड़ने लगते हैं, जिससे हिंसा, आगजनी और जान-माल की भारी हानि होती है। इससे पूरे समाज में डर और नफरत का माहौल फैल जाता है।
राष्ट्रीय एकता में बाधा: यह विचारधारा देश के नागरिकों के बीच फूट डालती है। इससे अलगाववाद, आतंकवाद और अविश्वास में वृद्धि होती है, जो अंततः देश की एकता और शांति को कमजोर करती है।
4. औद्योगिकीकरण के जाति व्यवस्था पर दो प्रभावों को लिखें।
उत्तर:- औद्योगिकीकरण के फलस्वरूप जब कारखाने, मशीनें और रोजगार के नए अवसर बढ़े, तो समाज की पारंपरिक जाति व्यवस्था में कई महत्वपूर्ण बदलाव आए। इसके दो मुख्य प्रभाव निम्नलिखित हैं —
i. जाति के आधार पर काम करने की प्रथा खत्म हुई पहले हर जाति का अलग-अलग काम तय होता था, लेकिन अब लोग अपनी पसंद और योग्यता के अनुसार कोई भी काम या नौकरी कर सकते हैं।
ii. पुरानी परंपराओं में कमी आई औद्योगीकरण से जजमानी जैसी पुरानी प्रथाएँ और सामाजिक पाबंदियाँ घट गईं। अब लोगों में समानता और सहयोग की भावना बढ़ी है।
प्रश्न 5. जाति की विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर: भारत में जाति व्यवस्था एक प्राचीन सामाजिक संरचना है, जहाँ समाज को अलग-अलग समूहों में विभाजित किया गया है। प्रत्येक जाति के अपने नियम, मर्यादाएँ और सामाजिक स्थान होते हैं। यह व्यवस्था मुख्य रूप से जन्म पर आधारित होती है और समाज में ऊँच-नीच का भाव पैदा करती है।
प्रसिद्ध समाजशास्त्रियों के अनुसार जाति की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
जी. एस. घुरिये (G.S. Ghurye) के अनुसार ("Caste and Class in India"):
समाज का खंडीय विभाजन: समाज कई जातियों में बँटा होता है, जहाँ प्रत्येक जाति का समाज में एक निश्चित स्थान होता है।
संस्तरण (Hierarchy): जातियों में ऊँच-नीच का एक क्रम पाया जाता है, जो सामाजिक असमानता को जन्म देता है।
खान-पान पर प्रतिबंध: विभिन्न जातियों के बीच साथ बैठकर भोजन करने या मेलजोल के कड़े नियम होते हैं।
नागरिक एवं धार्मिक अधिकार: ऊँची जातियों को विशेष धार्मिक और सामाजिक अधिकार प्राप्त होते हैं, जबकि अन्य को इनसे वंचित रखा जाता है।
निश्चित व्यवसाय: पारंपरिक रूप से हर जाति का अपना एक पेशा तय होता है (जैसे- ब्राह्मण का पूजा-पाठ, क्षत्रिय का युद्ध आदि)।
अंतर्विवाह: लोग केवल अपनी ही जाति के भीतर विवाह करते हैं।
डॉ. एन. के. दत्ता (N.K. Dutta) के अनुसार ("Origin and Growth of Caste in India"):
जन्मजात सदस्यता: व्यक्ति की जाति उसके जन्म से ही तय हो जाती है और इसे बदला नहीं जा सकता।
भोजन के नियम: हर जाति के भोजन ग्रहण करने से जुड़े अपने विशिष्ट नियम होते हैं।
वंशानुगत पेशा: जाति का व्यवसाय पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता रहता है।
अस्पृश्यता की भावना: जातियों के बीच भेदभाव और छुआछूत की भावना का होना।
ब्राह्मणों की सर्वोच्चता: इस व्यवस्था में ब्राह्मणों को सामाजिक पदानुक्रम में सबसे ऊँचा स्थान दिया गया है।
प्रश्न 6. सांप्रदायिकता का अर्थ एवं विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर: सांप्रदायिकता (Communalism) का अर्थ है अपने धर्म या समुदाय को दूसरे धर्मों से श्रेष्ठ मानना और अन्य धर्मों के प्रति घृणा, विरोध या शत्रुता का भाव रखना। यह विचारधारा समाज में धार्मिक भेदभाव और तनाव पैदा करती है, जो देश की राजनीति और अर्थव्यवस्था को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित करती है।
सांप्रदायिकता की प्रमुख विशेषताएँ:
धार्मिक पक्षपात: व्यक्ति केवल अपने धर्म के लोगों का पक्ष लेता है और दूसरे धर्मों को गलत समझने लगता है।
'हम' और 'वे' की भावना: समाज "हमारे धर्म के लोग" और "दूसरे धर्म के लोग" जैसे दो समूहों में बँट जाता है, जिससे एकता समाप्त हो जाती।
अविश्वास और घृणा: विभिन्न समुदायों के बीच आपसी भरोसे की कमी हो जाती है और वैमनस्य बढ़ता है।
सामाजिक अशांति: सांप्रदायिक सोच के कारण समाज में दंगे, हिंसा और तनाव का वातावरण बनता है, जिससे भाईचारा खत्म हो जाता है।
राष्ट्रीय एकता को खतरा: जब लोग देश हित से ऊपर धर्म को रखते हैं, तो राष्ट्र की मजबूती और एकता पर बुरा असर पड़ता है।
राजनीतिक स्वार्थ: कुछ राजनेता सत्ता पाने के लिए धर्म का सहारा लेते हैं, जिससे समाज में और अधिक विभाजन होता है।
जन-धन की हानि: सांप्रदायिक दंगों में न केवल निर्दोष लोगों की जान जाती है, बल्कि घरों और दुकानों के जलने से देश को भारी आर्थिक नुकसान भी होता है।
प्रश्न 5. भारतीय संदर्भ में सांस्कृतिक विविधता की दो विशेषताओं को लिखें।
उत्तर: भारत एक ऐसा अनूठा देश है जहाँ विभिन्न धर्मों, भाषाओं, पहनावे और परंपराओं के लोग एक साथ निवास करते हैं। यह विविधता ही मिलकर एक समृद्ध और गौरवशाली भारतीय संस्कृति का निर्माण करती है।
इसकी दो मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
आध्यात्मिक और नैतिक मूल्यों पर जोर: भारतीय संस्कृति मनुष्य को सत्य, अहिंसा, दया और परोपकार की शिक्षा देती है। यह हमें नैतिक मूल्यों के साथ सही मार्ग पर चलकर जीवन जीने के लिए प्रेरित करती है।
'वसुधैव कुटुंबकम्' की भावना: इसका अर्थ है "पूरी दुनिया एक परिवार है।" यह महान विचार लोगों के बीच आपसी प्रेम, एकता और सबका भला चाहने वाली सोच विकसित करता है।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1. क्षेत्रवाद की परिभाषा और इसके कारण को बताएं!
उत्तर: क्षेत्रवाद की परिभाषा: अपने क्षेत्र के प्रति अत्यधिक लगाव और प्रेम की वह भावना, जिसमें व्यक्ति अन्य क्षेत्रों या राष्ट्र के हितों की तुलना में अपने क्षेत्र को प्राथमिकता देता है और दूसरों के प्रति भेदभाव रखता है, क्षेत्रवाद कहलाता है।
क्षेत्रवाद के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
राजनीतिक कारण: कई राजनेता अपने व्यक्तिगत या दलगत स्वार्थ के लिए जनता में क्षेत्रीय भावनाओं को भड़काते हैं, जिससे एक क्षेत्र के लोग दूसरे क्षेत्र के विरुद्ध हो जाते हैं।
आर्थिक कारण: जब देश के कुछ क्षेत्रों का विकास अधिक होता है और कुछ पिछड़ जाते हैं, तो वहाँ विकास और रोजगार की कमी के कारण लोगों में असंतोष पनपता है, जो क्षेत्रीय आंदोलनों का रूप ले लेता है।
भौगोलिक कारण: भारत की भौगोलिक विविधता (अलग मौसम, जमीन और संसाधन) के कारण लोग अपनी विशिष्ट क्षेत्रीय पहचान को बनाए रखना चाहते हैं।
भाषाई कारण: भारत में भाषा की विविधता कभी-कभी विवाद का कारण बन जाती है, जिससे विभिन्न भाषा-भाषी क्षेत्रों के बीच दूरियाँ पैदा होती हैं।
सांस्कृतिक कारण: हर क्षेत्र की अपनी परंपराएं और रीति-रिवाज होते हैं। जब लोग अपनी संस्कृति को दूसरों से श्रेष्ठ समझने लगते हैं, तो यह क्षेत्रवाद को जन्म देता है।
मनोवैज्ञानिक कारण: जब व्यक्ति राष्ट्रीय हितों से ऊपर क्षेत्रीय हितों को रखने लगता है, तो संकुचित सोच के कारण क्षेत्रवाद बढ़ता है।
प्रश्न 2. जातिवाद क्या है? इसको प्रोत्साहन देने वाले चार कारणों की चर्चा करें।
उत्तर: जातिवाद (Casteism): जातिवाद एक ऐसी संकुचित सोच है जिसमें व्यक्ति अपनी जाति को दूसरों से श्रेष्ठ समझता है और केवल अपनी ही जाति के लोगों का पक्ष लेता है। यह भावना समाज की एकता और देश की प्रगति में बड़ी बाधा है।
जातिवाद को बढ़ावा देने वाले चार मुख्य कारण:
अपनी ही जाति में विवाह करना (अंतर्जातीय विवाह का अभाव): जब लोग विवाह जैसे संबंध केवल अपनी ही जाति तक सीमित रखते हैं, तो जातियों के बीच की दूरी बनी रहती है और आपसी मेलजोल नहीं बढ़ पाता।
जातिगत संगठन: विभिन्न जातियों के अपने संघ या संगठन होते हैं जो केवल अपनी जाति के हितों की बात करते हैं और चुनावों में अपनी ही जाति के उम्मीदवार को वोट देने के लिए प्रेरित करते हैं।
नेताओं की गलत राजनीति: वोट बैंक की राजनीति के लिए कई राजनेता लोगों की जातीय भावनाओं को भड़काते हैं, जिससे समाज में विभाजन बढ़ता है और जातिवाद मजबूत होता है।
सामाजिक मेलजोल की कमी: आज के शहरी और व्यस्त जीवन में लोगों के बीच सामाजिक संवाद कम हो गया है। एक-दूसरे को न जानने और समझने के कारण भी लोग अपनी ही जाति के दायरे तक सीमित रह जाते हैं।
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