Hindi Chapter 13 शिक्षा — लेखक: जे. कृष्णमूर्ति Subjective
लेखक परिचय :-
लेखक- जे कृष्णमूर्ति
जन्म- 12 मई 1895
जन्म-स्थान- मदनपल्ली, चित्तूर, आंध्र प्रदेश
निधन- 17 फरवरी 1986
निधन स्थान- ओजई, कैलिफोर्निया
पूरा नाम- जिद्दू कृष्णमूर्ति
माता- संजीवाम्मा
पिता- नारायणा जिद्दू
1. लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1. जीवन में विद्रोह का क्या स्थान है?
उत्तर: जीवन में विद्रोह का बहुत बड़ा महत्व है। विद्रोह पुरानी, सड़ी-गली परंपराओं और बुराइयों को खत्म करने के लिए जरूरी है। एक विद्रोही व्यक्ति ही समाज के लिए नया रास्ता बनाता है और निडर होकर सत्य की खोज कर सकता है। सत्य को जानने के लिए मानसिक गुलामी से मुक्त होना अनिवार्य है।
प्रश्न 2. जहाँ भय है वहाँ मेधा (बुद्धि) नहीं हो सकती। क्यों?
उत्तर: मेधा का अर्थ है वह शक्ति जिससे हम बिना किसी दबाव के सत्य को समझ सकें। जहाँ डर होता है (चाहे वह फेल होने का डर हो, नौकरी खोने का या समाज का), वहाँ बुद्धि संकुचित हो जाती है। डर इंसान को लकीर का फकीर बना देता है और वह नया कुछ नहीं सोच पाता। इसलिए, भय और बुद्धि एक साथ नहीं रह सकते।
प्रश्न 3. 'जीवन क्या है?' इसका परिचय लेखक ने किस रूप में दिया है?
उत्तर: लेखक के अनुसार जीवन बहुत विशाल, असीम और रहस्यों से भरा है। यह केवल आजीविका कमाना नहीं है, बल्कि इसमें प्रकृति, भावनाएँ, धर्म, ध्यान, प्रेम और सुख-दुख का अनूठा संगम शामिल है। शिक्षा का असली काम हमें जीवन की इसी व्यापकता को समझने में मदद करना है।
प्रश्न 4. 'बचपन से ही आपका ऐसे वातावरण में रहना अत्यंत आवश्यक है जो स्वतंत्रपूर्ण हो।' क्यों?
उत्तर: बचपन में स्वतंत्र माहौल इसलिए जरूरी है ताकि बच्चा बिना किसी दबाव के सोच सके और अपनी रुचि को पहचान सके। स्वतंत्र वातावरण में ही इंसान का सही मानसिक विकास होता है और वह जीवन के गहरे अर्थों और सत्य को समझ पाता है। स्वतंत्रता और अनुशासन का सही मेल ही पूर्ण जीवन का आधार है।
2. दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1. 'शिक्षा' शीर्षक लेख का सारांश लिखें।
उत्तर: जे. कृष्णमूर्ति के अनुसार, शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल डिग्रियाँ हासिल करना या नौकरी पाना नहीं है, बल्कि इंसान को पूरी तरह से स्वतंत्र, निडर और समझदार बनाना है।
सच्ची शिक्षा: वह है जो हमें सीमाओं और छोटी सोच से मुक्त करे।
जीवनभर सीखना: शिक्षा एक ऐसी प्रक्रिया है जो स्कूल तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन भर चलती रहती है।
भय से मुक्ति: जहाँ डर है, वहाँ मेधा नहीं हो सकती। शिक्षा का कार्य हमें उस डर से मुक्त करना है ताकि हम अपने भीतर की रोशनी (ध्यान) को पहचान सकें और सत्य की खोज कर सकें।
प्रश्न 2. क्रांति करना, सीखना और प्रेम करना तीनों पृथक-पृथक प्रक्रियाएँ हैं या नहीं? कैसे?
उत्तर: ये तीनों अलग-अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई प्रक्रियाएँ हैं। क्रांति का अर्थ है पुरानी व्यवस्था को तोड़कर नया सोचना; सीखना वह प्रक्रिया है जो जीवनभर चलती है; और प्रेम वह आधार है जो इन सबको सार्थकता देता है। जब हम प्रेम और ध्यान से कुछ सीखते हैं, तो वह अपने आप में एक आंतरिक क्रांति बन जाती है।
3. सप्रसंग व्याख्या
पंक्ति: "यहाँ प्रत्येक मनुष्य किसी न किसी के विरोध में खड़ा है और किसी सुरक्षित स्थान पर पहुँचने के लिए प्रतिष्ठा, सम्मान, शक्ति और आराम के लिए निरंतर संघर्ष कर रहा है।"
व्याख्या: प्रस्तुत पंक्तियाँ जे. कृष्णमूर्ति द्वारा रचित पाठ 'शिक्षा' से ली गई हैं। लेखक का कहना है कि आज का समाज प्रतियोगिता और स्वार्थ पर टिका है। हर व्यक्ति दूसरों से आगे निकलने, ऊँचा पद पाने और अधिक शक्ति हासिल करने की होड़ में लगा है। इस अंधी दौड़ के कारण दुनिया में शांति और स्वतंत्रता खत्म होती जा रही है। हमें इस संघर्ष से ऊपर उठकर एक निडर और स्वतंत्र समाज की रचना करनी चाहिए।
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