Hindi Chapter 5. रोज (कहानी) subjective
-: लेखक का परिचय :-
लेखक - सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय
जन्म - 07 मार्च 1911 ई०
जन्म स्थान - कसेया, कुशीनगर, उत्तर प्रदेश
मूल निवास - करतारपुर, पंजाब
निधन - 04 अप्रैल 1987 ई०
निधन स्थान - नई दिल्ली
माता - व्यंती देवी
पिता - डॉक्टर हीरानंद शास्त्री (प्रख्यात पुरातत्ववेत्ता)
शिक्षा -
प्रारंभिक चार साल लखनऊ में घर पर पढ़े
मैट्रिक 1925 में पंजाब विश्वविद्यालय से किये
इंटर 1927 में मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज से किये
B.Sc 1929 में फोरमन कॉलेज, लाहौर, पंजाब से किये
M.A (अंग्रेजी) पंजाब विश्वविद्यालय लाहौर से किये थे।
लघु उत्तरीय प्रश्न - 2 अंक
1. 'रोज' कहानी की मालती ने किताब का क्या किया था? (2019)
उत्तर- अज्ञेय द्वारा रचित 'रोज' कहानी की मुख्य पात्र मालती बचपन में पढ़ने में रुचि नहीं लेती थी। एक बार जब उसके पिता ने उसे एक किताब लाकर दी और प्रतिदिन बीस पन्ने पढ़ने का आदेश दिया, तो मालती ने उन पन्नों को पढ़ा नहीं, बल्कि वह रोज दस से बीस पन्ने फाड़कर फेंक दिया करती थी।
2. मालती के पति का परिचय दें। (2018, 2022) अथवा, महेश्वर के चरित्र का वर्णन करें।
उत्तर- महेश्वर 'रोज' कहानी की नायिका मालती का पति है। वह पेशे से एक डॉक्टर है जो एक पहाड़ी इलाके में कार्यरत है। दिन-रात गंभीर रोगियों के बीच रहने के कारण उसका स्वभाव संवेदना शून्य (भावहीन) हो गया है। उसके जीवन में अब कोई उत्साह या हंसी नहीं बची है; वह एक नीरस और मशीन की तरह यंत्रवत जीवन जीता है। यहाँ तक कि किसी रोगी का अंग काटना भी उसके लिए एक सामान्य प्रक्रिया बन चुकी है।
3. मालती के घर का वातावरण कैसा था?
उत्तर- मालती के घर का माहौल अत्यंत नीरस, उदासी भरा और यंत्रवत था। घर में प्रेम, उत्साह और अपनेपन जैसी भावनाओं का अभाव महसूस होता था। मालती पूरे दिन मशीन की तरह घर के कार्यों में व्यस्त रहती थी, उसका पति रोगियों के कारण संवेदनहीन हो चुका था और उनका बच्चा भी हमेशा चिड़चिड़ा रहता था।
4. लेखक और मालती के संबंध का परिचय 'रोज' शीर्षक कहानी के आधार पर दें। (2024) अथवा, लेखक और मालती के बीच कैसा संबंध था?
उत्तर- लेखक और मालती के बीच दूर के रिश्ते में भाई-बहन का संबंध था, परंतु बचपन में साथ-साथ खेलने और पढ़ने के कारण उनके बीच एक गहरे मित्र जैसा रिश्ता था। वे एक-दूसरे से बहुत खुलकर और बेझिझक बातें किया करते थे।
5. लेखक को मालती के आँगन में दोपहर में भी शाम की छाया जैसी उदासी क्यों दिखाई पड़ी?
उत्तर- मालती अपने क्वार्टर में अक्सर अकेली रहती थी और वहां के नीरस वातावरण के कारण वह स्वयं भी भीतर से संवेदन शून्य हो चुकी थी। उसका जीवन खुशियों से रहित और यंत्रवत हो गया था। उसके चरित्र और घर की इसी घुटन और उदासी के कारण लेखक को उसके आँगन में दोपहर के समय भी शाम जैसी गहरी उदासी महसूस हुई।
6. गैंग्रीन क्या है?
उत्तर- पहाड़ी क्षेत्रों में काँटा चुभने से होने वाली एक खतरनाक बीमारी को गैंग्रीन कहा जाता है। यदि समय पर इसका उपचार न हो, तो संक्रमण बढ़ने के कारण कभी-कभी प्रभावित हाथ या पैर को काटने तक की नौबत आ जाती है। कहानी में मालती का पति महेश्वर इसी बीमारी का इलाज करता है।
7. "पहले तो रात-रात भर नींद नहीं आती थी" मालती के इस कथन का क्या तात्पर्य है?
उत्तर- इस कथन से मालती के अतीत और वर्तमान के बीच के बदलाव का पता चलता है। पहले वह दूसरों के दर्द और पीड़ा को देखकर भावुक हो जाती थी, जिसके कारण उसे नींद नहीं आती थी। परंतु समय के साथ वह इतनी संवेदनहीन और कठोर हो गई है कि अब उसे किसी की पीड़ा का अनुभव नहीं होता और न ही उससे उसकी नींद प्रभावित होती है।
8. मालती ने सरकारी अस्पताल पर क्या व्यंग्य किया है?
उत्तर- मालती ने सरकारी अस्पताल की व्यवस्था पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा है कि वहां रोगियों का सही इलाज नहीं होता और डॉक्टरों में मरीजों के प्रति कोई सहानुभूति नहीं होती। डॉक्टर इस बात से बेपरवाह रहते हैं कि मरीज जिए या मरे; वे छोटी सी बात पर सीधे हाथ-पैर काट देते हैं या मरीज को रेफर कर देते हैं। यही सरकारी अस्पतालों की कार्यशैली बन गई है।
महत्वपूर्ण जानकारी
अज्ञेय हिंदी के आधुनिक साहित्य में एक प्रमुख और प्रतिभाशाली व्यक्तित्व थे।
अज्ञेय जी आधुनिक साहित्य के एक प्रमुख कवि, कथाकार, विचारक एवं पत्रकार थे।
अज्ञेय जी ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कारावास और जेल की यातनाएँ भी सही थीं।
अज्ञेय जी ने द्वितीय महायुद्ध के दौरान सेना में नौकरी की थी।
अज्ञेय जी आजीवन सैलानी (यायावर) रहे, घूमना उन्हें बेहद पसंद था।
रोमांचक यात्राएँ करना उनका स्वभाव और शौक दोनों था।
कथा साहित्य में प्रेमचंद और जयशंकर प्रसाद के बाद अज्ञेय जी की भूमिका निर्णायक रही है।
अज्ञेय लिखित 'गैंग्रीन' (1934) शीर्षक कहानी ही यहाँ प्रस्तुत है; बाद में इसका नाम लेखक ने 'रोज' रख दिया था।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न - 5 अंक
1. 'रोज' कहानी का सारांश लिखें। या 'रोज' कहानी के केन्द्रीय सन्देश की समीक्षा करें। या 'रोज' शीर्षक कहानी का उद्देश्य लिखें।
उत्तर- 'रोज' कहानी अज्ञेय जी द्वारा रचित एक मनोवैज्ञानिक कहानी है। यह कहानी मध्यमवर्गीय घरेलू नारी के जीवन की एकरसता (Monotony) को बड़ी मार्मिकता के साथ प्रस्तुत करती है। इसमें आधुनिक जीवन की उदासी, ऊब, घुटन और पीड़ा का हृदयस्पर्शी चित्रण किया गया है। कहानी की मुख्य पात्र मालती, जो बचपन में बेहद चंचल थी, विवाह के बाद पूरी तरह बदल गई है। वह अब एक बच्चे की माँ है और उसका पति (महेश्वर) एक डॉक्टर है। पति के काम पर चले जाने के बाद मालती अपना सारा समय घर के नीरस कार्यों में कोल्हू के बैल की तरह खटते हुए बिताती है। उसके जीवन में न कोई हंसी है, न उल्लास। इस प्रकार लेखक ने मालती और महेश्वर के दैनिक जीवन के माध्यम से एक थके हुए और यंत्रवत समाज का चित्रण किया है।
2. 'रोज' शीर्षक कहानी के आधार पर मालती का चरित्र चित्रण करें। (2015, 2016) अथवा, 'रोज' कहानी में कहानीकार ने किस प्रकार मालती की अंत: स्थिति व बाह्य स्थिति का वर्णन किया है? (2018)
उत्तर- मालती 'रोज' कहानी की नायिका है। बचपन में वह बहुत चंचल, शरारती और मुक्त स्वभाव की थी। उछलना-कूदना, हंसी-मजाक करना और पढ़ाई से बचने के लिए किताब के पन्ने फाड़ देना उसकी दैनिक आदतों में शामिल था। परंतु विवाह के बाद उसकी स्थिति पूरी तरह बदल गई। एक डॉक्टर की पत्नी होने के नाते वह एक ऐसे घर में कैद होकर रह गई है जहाँ केवल उदासी का वास है। वह अंदर और बाहर दोनों तरफ से प्रेम और उत्साह के अभाव में जी रही है। वह अब हमेशा उदास और खोई-खोई रहती है, जो उसके व्यक्तित्व में आए भारी बदलाव को दर्शाता है।
व्याख्यात्मक प्रश्न - 4 अंक
1. "इस समय मैं यही सोच रहा था कि वही उद्धत और चंचल मालती कितनी सीधी हो गई है।"
उत्तर- प्रस्तुत पंक्ति अज्ञेय जी द्वारा रचित 'रोज' शीर्षक कहानी से ली गई है। यहाँ लेखक मालती के बचपन और वर्तमान के व्यक्तित्व की तुलना कर रहा है। बचपन में जो मालती चंचल और विद्रोही स्वभाव की थी, विवाह के बाद वह परिस्थितियों के कारण अत्यंत शांत और सीधी हो गई है। उसका जीवन अब केवल घरेलू जिम्मेदारियों और समय के बंधनों (घड़ी की सुइयों) के बीच यंत्रवत गुजर रहा है।
2. "मुझे लग रहा था कि इस घर पर जो छाया घिरी हुई है वह अज्ञात रहकर भी मानो मुझे भी वश में कर रही है।"
उत्तर- प्रस्तुत पंक्ति अज्ञेय जी की कहानी 'रोज' से उद्धृत है। इसमें लेखक ने मालती के घर के निर्जीव और बोझिल वातावरण का सजीव वर्णन किया है। लेखक को महसूस होता है कि मालती के घर में एक ऐसी अदृश्य उदासी और शून्यता पसरी हुई है, जिसका प्रभाव वहां आने वाले मेहमानों पर भी पड़ता है। लेखक वहां कुछ ही समय बिताने पर खुद भी उसी उदासी और नीरसता का अनुभव करने लगता है।
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