12th Hindi Chapter 6 Kavita subjective
अध्याय – 6. तुमुल कोलाहल कलह में
-: कवि का परिचय :-
कवि: जयशंकर प्रसाद
जन्म: 1889 (माघ शुक्ल दशमी, संवत् 1946)
जन्म-स्थान: वाराणसी
निधन: 15 नवंबर 1937
निधन-स्थान: वाराणसी (काशी)
माता: प्रभावती देवी
पिता: देवी प्रसाद साहु
पितामह (दादा): शिवरत्न साहु [सुरती (तंबाकू) बनाने के कारण ‘सुँघनी साहु’ के नाम से विख्यात हुए।]
शिक्षा
(i) आठवीं तक।
(ii) संस्कृत, हिन्दी, फारसी, उर्दू की शिक्षा घर पर नियुक्त शिक्षकों द्वारा हुई।
विशेष जीवन परिस्थितियाँ
(i) 12 वर्ष की अवस्था में पिता की मृत्यु हो गई।
(ii) उसके 2 वर्ष बाद माता की भी मृत्यु हो गई।
(iii) परिवार में गृहकलह की स्थिति आ गई।
(iv) ज्येष्ठ भ्राता (बड़ा भाई) शंभु रतन की मृत्यु से घर में संकट की स्थिति उत्पन्न हो गई।
(v) सभी उत्तरदायित्व प्रसाद जी के कंधों पर आ गए।
प्रमुख रचनाएँ
श्रेणी | रचनाएँ (प्रकाशन वर्ष) |
काव्य संकलन | * झरना (1918) * आँसू (1925) * लहर (1933) |
अतुकांत रचनाएँ | * महाराणा का महत्व * करुणालय * प्रेम पथिक |
प्रबंध काव्य | * कामायनी (1936) |
नाटक | * कल्याणी परिणय (1912) * प्रायश्चित (1914) * राज्यश्री (1915) * विशाख (1929) * कामना (1927) * जन्मेजय का नागयज्ञ (1926) * स्कंदगुप्त (1926) * एक घूँट (1928) * चन्द्रगुप्त (1931) * ध्रुवस्वामिनी (1933) |
कथा संग्रह | * छाया (1912) * प्रतिध्वनि (1931) * इंद्रजाल (1936) |
उपन्यास | * कंकाल (1929) * तितली (1934) * इरावती (1940) — [यह अपूर्ण हैं] |
Note:
कलाधर उपनाम से ब्रजभाषा में सवैयों की रचना किये।
प्रसाद की प्रेरणा से उनके भांजे अंबिका प्रसाद ने 'इंदु' का प्रकाशन 1909 से प्रारंभ किया।
प्रसाद जी की पहली काव्य रचना ‘चित्राधार’ है, जो ब्रजभाषा में 1918 में प्रकाशित हुई थी।
महत्वपूर्ण जानकारी
जयशंकर प्रसाद छायावाद युग के कवि हैं।
प्रसाद जी एक महान नाटककार, उपन्यासकार, कहानीकार एवं निबंधकार भी हैं।
प्रसाद जी आरंभ में ब्रजभाषा में कविता लिखें। बाद में उन्होंने भाषा-खड़ी बोली हिन्दी अपना लिये।
प्रसाद जी का सर्वश्रेष्ठ रचना कामायनी है। इसे हिंदी का श्रेष्ठतम महाकाव्य भी कहा जाता है।
प्रस्तुत गीत कामायनी महाकाव्य से लिया गया है। इस महाकाव्य की नायिका श्रद्धा है जो स्वयं कामायनी है।
लघु उत्तरीय प्रश्न: -
1. हृदय की बात का क्या अर्थ है?
उत्तर:- हृदय की बात का तात्पर्य है मन की बात। हृदय में प्रेम, दया, ममता, कोमलता आदि का वास होता है। इन भावनाओं से युक्त बातों को हृदय की बात कहा गया है।
2. बरसात को सरस कहने का क्या तात्पर्य है?
उत्तर:- सरस बरसात का तात्पर्य है भीतर तक सरस कर देने वाली बरसात अर्थात झमाझम वर्षा बरसने को सरस बरसात कहा गया है जिसमें पेड़ पौधे आनन्द से झूमने लगते हैं। गर्मी के कारण जलती धरती में भीतर तक रस संचार हो जाने को सरस बरसात कहा गया है।
3. सजल जलजात का क्या अर्थ है?
उत्तर:- सजल जलजात का अर्थ है रसपूर्ण कमल जो सुन्दर, स्वच्छ और तरोताजा हो, जिस पर भौंरे दीवाने हो जाय।
3. सजल जलजात का क्या अर्थ है?
उत्तर:- सजल जलजात का अर्थ है रसपूर्ण कमल जो सुन्दर, स्वच्छ और तरोताजा हो, जिस पर भौंरे दीवाने हो जाय।
4. कविता में उषा की किस भूमिका का उल्लेख है?
उत्तर:- कविता में उषा को प्रकाश रूप में देखा गया है। जीवन से हताश-निराश मन में नई आशा संचार करने वाली शक्ति के रूप में उषा का चित्रण किया गया है। यह दुख के अंधकार के बीच सुख के खिले फूल का प्रभात है।
5. चातकी किसके लिए तरसती है?
उत्तर:- चातकी स्वाति नक्षत्र की एक छोटी सी बूंद के लिए तरसती है। अर्थात जल कण के लिए तरसती है।
चातकी (चातक पक्षी की मादा) के बारे में यह पौराणिक और प्राकृतिक मान्यता है कि वह केवल स्वाति नक्षत्र में बरसने वाले बादलों के जल को ही पीती है। नदी, तालाब या झरने का पानी चाहे कितना भी शुद्ध क्यों न हो, वह उसे नहीं छूती। वह प्यासी मर जाएगी, लेकिन स्वाति नक्षत्र के जल-कण के अलावा किसी और चीज़ से अपनी प्यास नहीं बुझाती।
6. इस कविता का केन्द्रीय भाव क्या है?
उत्तर:- प्रस्तुत कविता के माध्यम से कवि ने पुरुष के जीवन में नारी के योगदान को स्पष्ट करने का प्रयास किया है। कर्म संकुल पुरुष के जीवन में झंझावातों का क्रम चलता ही रहता है। नारी उनके तपते मन पर शीतल अवलेप लगाने का काम करती है।
यहाँ श्रद्धा सम्पूर्ण नारी वर्ग का प्रतीक है। नारी पुरुषों की अहलादिका शक्ति होने के साथ-साथ संचालिका वृत्ति भी होती है। नारी जीवन से निराश उदास दुखी मन के लिए सुख-सौंदर्य की प्रतिमूर्ति होती है।
7. प्रसाद की काव्यगत विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर:- छायावाद के पुरोधा कवि प्रसाद वास्तव में भारतीय संस्कृति के प्रवक्ता दिखाई पड़ते हैं। उन्होंने दुखमय संसार में जीवन के प्रति आँसू तो बहाया परन्तु झरना और लहर के रूप में जीवन यात्रा करने का संदेश भी दिया। इतना ही नहीं कामायनी के साथ टूटे - बिखरे जीवन की शुरुआत कर नवनिर्माण पर भी काफी जोर दिया है।
8. जयशंकर प्रसाद किस काव्य-धारा के कवि माने जाते हैं ?
उत्तर:- जयशंकर प्रसाद छायावादी काव्य-धारा के कवि माने जाते हैं।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न: -
1. तुमुल कोलाहल कलह में शीर्षक कविता का भावार्थ लिखें।
उत्तर:- “तुमुल कोलाहल कलह में” शीर्षक नामक कविता जयशंकर प्रसाद जी द्वारा रचित है। जिसे कामायनी महाकाव्य से लिया गया है। कोलाहल भरे संसार में हृदय की बात – श्रद्धा और मनु का मधुर मिलन होता है। श्रद्धा हृदय का प्रतीक है। इड़ा बुद्धि का प्रतीक है। और मनु मन का प्रतीक है। यह संसार कोलाहल से भरा हुआ है। यह संसार मरुभूमि की तरह है। निराशा और आँसू इस संसार में भरे हुए है। ऐसी परिस्थिति में नारी ही पुरुष को चैन, सुकून, शांति प्रेम और सुख देती है। श्रद्धा ही मनु को सुख प्रदान करती है।
सप्रसंग व्याख्यात्मक प्रश्न
1. पवन की प्राचीर में रुक जल जीवन जा रहा झुका |
उत्तर:- प्रस्तुत पंक्ति जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित “तुमुल कोलाहल कलह में” शीर्षक कविता से लिया गया है। इस पंक्ति के माध्यम से कवि का कहना है कि जब जीवन पवन की ऊँची चहार दिवारी बंद होकर झुक जाता है। जब मानव जीवन झुलसे आदमी को फूल की तरह खिला देती है।
2. चेतना थक-सी रही, तब मै मलय की बात रे मन |
उत्तर:- प्रस्तुत पंक्ति जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित “तुमुल कोलाहल में” शीर्षक कविता से लिया गया है। इस पंक्ति के माध्यम से कवि का कहना है कि जब पुरुष दिनभर की भाग दौड़ में थक जाता है तब मन की चंचलता के कारण शरीर थककर आराम खोजता है तब व्यक्ति का हृदय ही उसको आराम देता है।
नोट: दाहिनी तरफ नीचे दिए गए 'वस्तुनिष्ठ प्रश्न' (MCQs) धुंधले और कटे होने के कारण पूरी तरह पढ़ने योग्य नहीं हैं। यदि आप उनके पूरे प्रश्न लिख कर भेजेंगे, तो मैं उन्हें भी इसी तरह व्यवस्थित कर दूँगा।
काव्यखंड अध्याय- 6: तुमुल कोलाहल कलह में
भूमिका (सामान्य अर्थ):
अर्थ - प्रस्तुत पंक्तियाँ छायावाद के प्रमुख कवि जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित महाकाव्य कामायनी से ली गई है। जिसमें श्रद्धा मन को पाकर कहती है कि इस अत्यंत कोलाहल (शोर-शराबा) में मैं हृदय की बात की तरह हूँ।
पैराग्राफ 1
विकल होकर नित्य चंचल,
खोजती जब नींद के पल;
चेतना थक सी रही तब,
मैं मलय की बात रे मन !
अर्थ - श्रद्धा पुरुष के जीवन में नारी के महत्व को रेखांकित करती हुई कहती है। पुरुष जब दिनभर की भाग-दौड़ और मन की चंचलता के कारण थक जाता है और व्याकुल होकर आराम करना चाहता है तो ऐसी स्थिति में श्रद्धा (नारी का हृदय) मलय पर्वत से चलने वाली सुगंधित हवा की तरह शांति और विश्राम देती है। कवि कहना चाहते हैं कि मन चंचल है और मन की चंचलता के कारण शरीर थक कर आराम खोजता है ऐसी स्थिति में व्यक्ति का हृदय ही उसको आराम देता है।
पैराग्राफ 2
चिर-विषाद विलीन मन की
इस व्यथा के तिमिर वन की;
मैं उषा सी ज्योति रेखा,
कुसुम विकसित प्रात रे मन !
अर्थ - मन अंधकाररूपी दुख के वन में दीर्घ काल के लिए डूबा हुआ है। मैं उसमें सुबह की किरणों की तरह हूँ। मैं इस अंधकार से पूर्ण वन में पुष्प से भरे हुए सुबह के समान हूँ।
पैराग्राफ 3
जहाँ मरु ज्वाला धधकती,
चातकी कन को तरसती;
उन्हीं जीवन घाटियों की,
मैं सरस बरसात रे मन !
अर्थ - हे मन ! उस धधकते हुए मरुस्थल में जहां चातकी पानी के बूंदों के लिए तरसती है। मैं जीवन की घाटी में सरस बरसात की तरह हूँ। कवि कहते हैं कि जब मानव जीवन कष्ट की अग्नि में मरुस्थल की तरह धधकती है तब आनंद रूपी बारिश ही उसके चित्त रूपी चातकी को सुख प्रदान करती है।
पैराग्राफ 4
पवन की प्राचीर में रुक,
जला जीवन जा रहा झुक;
इस झुलसते विश्व-वन की,
मैं कुसुम ऋतु रात रे मन !
अर्थ - हे मन ! जब जीवन पवन की ऊँची चहार दीवारी बंद होकर झुक जाता है। जब मानव जीवन झुलस जाता है। ऐसी स्थिति में मैं वसंत की रात की तरह हूँ। जो इस झुलसे हुए मन को हरा-भरा कर सकती हूँ।
पैराग्राफ 5
चिर निराशा नीरधर से,
प्रतिच्छायित अश्रु सर में;
मधुप मुखर मरंद मुकुलित,
मैं सजल जलजात रे मन !
अर्थ - हे मन ! गहरी निराशा के बादलों से घिरे हुए आँसुओं के तालाब में मैं करुणा से भरी हुई कमल के समान हूँ जिसपर भौंरे गूंजते रहते है।
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