12th Home science chapter 4 Subjective (मातृशिल्प एवं बालविकास)
लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Questions)
1. प्रसूता की देखभाल के प्रमुख बिन्दु कौन-कौन से हैं?
उत्तर- प्रसूता की देखभाल के प्रमुख बिन्दु निम्न हैं:
प्रसूता को प्रसव के बाद साफ बिस्तर पर सुलाना चाहिए।
उसे पूर्ण विश्राम करने देना चाहिए।
उसके आन्तरिक अंगों को स्वच्छ करना चाहिए।
प्रसूता को पौष्टिक, हल्का भोजन देना चाहिए।
2. नवजात शिशु की नियमित देखभाल के प्रमुख बिन्दु बताइए।
उत्तर- नवजात शिशु की नियमित देखभाल के प्रमुख बिन्दु निम्नलिखित हैं:
नवजात शिशु को साफ कपड़े से पोंछना चाहिए।
नवजात शिशु का नाल सावधानीपूर्वक काटना चाहिए।
संक्रमित व्यक्ति को नवजात से दूर रखना चाहिए।
जिस कमरे में नवजात को रखा जायें, उसमें स्वच्छ वायु व उचित प्रकाश होना चाहिए।
3. नवजात शिशु के जन्म के पश्चात की आवश्यकताएँ क्या हैं?
उत्तर- जन्म के पश्चात शिशु की मुख्य आवश्यकताएँ इस प्रकार हैं:
माँ की गर्माहट – जन्म के बाद बच्चा नाजुक होता है, इसलिए माँ के शरीर की गर्मी उसे सुरक्षित और आराम देती है।
सामान्य साँस लेना – बच्चा जैसे ही पैदा होता है, उसे ठीक से साँस लेना शुरू करना चाहिए।
माँ का दूध – यह शिशु का पहला और सबसे अच्छा भोजन है, जो उसे ताक़त और बीमारियों से बचाव देता है।
सफाई – बच्चे का शरीर, कपड़े और आसपास की जगह साफ़ रहनी चाहिए, ताकि वह स्वस्थ रहे।
संक्रमण से बचाव – नवजात जल्दी बीमार पड़ सकता है, इसलिए उसकी विशेष देखभाल और सफ़ाई ज़रूरी है।
4. स्तनपान किसे कहते है।
उत्तर- जब माँ अपने स्तनों से अपने बच्चे को दूध पिलाती है, उसे स्तनपान कहते हैं। जन्म के तुरंत बाद शिशु के लिए सबसे पहला और सबसे अच्छा आहार माँ का दूध होता है।
5. प्रसव किसे कहते है।
उत्तर- माँ के गर्भ से शिशु के बाहर आने की प्रक्रिया को प्रसव कहते हैं।
6. टीकाकरण से आप क्या समझते है।
उत्तर- जब बच्चे को बीमारियों से बचाने के लिए इंजेक्शन, दवा की बूँदें या टीका (वैक्सीन) दिया जाता है और उसके शरीर में रोगों से लड़ने की ताकत बनाई जाती है, तो इसे टीकाकरण कहते हैं।
7. BCG का टीका कब और क्यों लगाया जाता है।
उत्तर- BCG का पूरा नाम बैसिलस कैलमेट-ग्यूरिन (Bacillus Calmette-Guerin) है। यह टीका तपेदिक (टीबी/क्षय रोग) से बचाव के लिए लगाया जाता है। सभी नवजात शिशुओं को जन्म के 24 घंटे के भीतर BCG का टीका दिया जाता है।
8. निर्जलीकरण किसे कहते है।
उत्तर- जब उल्टी, दस्त या अधिक पसीने से शरीर में पानी की कमी हो जाती है, तो इसे निर्जलीकरण (Dehydration) कहते हैं।
9. स्तनमोचन किसे कहते है।
उत्तर- जब शिशु को 6 महीने की उम्र के बाद माँ के दूध के साथ-साथ अन्य खाने की चीजें (जैसे दलिया, खिचड़ी, फल आदि) दी जाने लगती हैं, तो इसे स्तनमोचन (Weaning) कहते हैं।
10. एक नवजात शिशु की वैकल्पिक देखभाल संबंधियों द्वारा किये जाने के लाभों
उत्तर- संबंधियों द्वारा शिशु की देखभाल करने के निम्नलिखित लाभ हैं:
बच्चे का सही विकास होता है।
उसे प्यार और सुरक्षा मिलती है।
ज़रूरत पड़ने पर संबंधी, माता-पिता की मदद और मार्गदर्शन करते हैं।
बच्चे में अच्छे संस्कार और नैतिक गुण आते हैं।
उसका सामाजिक और व्यक्तित्व विकास बेहतर होता है।
11. मातृत्व के पूर्व स्त्री को मानसिक रूप से तैयार होना क्यों आवश्यक है?
उत्तर- क्योंकि मानसिक रूप से तैयार रहने से स्त्री गर्भावस्था और प्रसव की कठिनाइयों को आसानी से सहन कर पाती है और बच्चे की देखभाल अच्छे तरीके से कर सकती है।
12. प्रसव के लिए पूर्व तैयारी का क्या महत्व है? उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- प्रसव से पहले तैयारी करने से माँ और बच्चा दोनों सुरक्षित रहते हैं। जैसे – समय पर अस्पताल पहुँचना, साफ कपड़े, ज़रूरी दवाइयाँ और साधन पहले से तैयार रखना।
13. गाँव में प्रसव सम्बन्धी समस्याएँ क्या हो सकती हैं?
उत्तर-
i. अस्पताल की कमी – ज़्यादातर गाँवों में पास में कोई अच्छा अस्पताल या प्रसव केंद्र नहीं होता।
ii. डॉक्टर और प्रशिक्षित दाई का न होना – सही समय पर मदद करने के लिए अनुभवी डॉक्टर या दाई (मिडवाइफ) नहीं मिल पाती।
iii. साफ-सफाई की कमी – कई बार प्रसव गंदगी या असुरक्षित जगह पर होता है, जिससे माँ और बच्चे को इंफेक्शन का खतरा बढ़ जाता है।
iv. समय पर मदद न मिलना – अचानक कोई समस्या आ जाए तो तुरंत एम्बुलेंस, दवा या अस्पताल तक पहुँचने की सुविधा नहीं होती।
14. प्रसव के लिए कौन-से उपकरणों की आवश्यकता होती है?
उत्तर- प्रसव के समय कुछ ज़रूरी चीजें होती हैं – जैसे साफ कपड़े, हाथ धोने के लिए साबुन, गर्म पानी, नाल काटने के लिए साफ कैंची और बाँझ धागा, ज़रूरी दवाइयाँ और अन्य साफ (स्टरलाइज़) उपकरण।
15. अस्पताल में प्रसव कराने के मुख्य लाभों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
माँ और बच्चा दोनों सुरक्षित रहते हैं।
डॉक्टर और नर्स तुरंत मदद करते हैं।
ज़रूरी दवाइयाँ और साधन आसानी से मिल जाते हैं।
साफ-सफाई रहती है, जिससे संक्रमण का खतरा कम होता है।
कोई समस्या होने पर तुरंत इलाज मिल जाता है।
16. नवजात शिशु के रुदन से क्या तात्पर्य होता है?
उत्तर- जन्म के बाद जब बच्चा रोता है तो इसका मतलब है कि वह सही से साँस ले रहा है और उसका स्वास्थ्य ठीक है।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions)
1. टीकाकरण से आप क्या समझते है। और इसके प्रकार का वर्णन करें ?
उत्तर- जब बच्चे को बीमारियों से बचाने के लिए इंजेक्शन, दवा की बूँदें या टीका (वैक्सीन) दिया जाता है और उसके शरीर में रोगों से लड़ने की ताकत बनाई जाती है, तो इसे टीकाकरण कहते हैं।
यह दो प्रकार के होते हैं:-
(i) कृत्रिम टीकाकरण– जब दवाइयाँ या वैक्सीन इंजेक्शन, बूँद या अन्य तरीके से शरीर में दी जाती हैं और उनसे बीमारियों से लड़ने की ताकत मिलती है, तो इसे कृत्रिम टीकाकरण कहते हैं।
(ii) प्राकृतिक टीकाकरण– जब कोई व्यक्ति किसी बीमारी से ग्रसित होता है और ठीक हो जाता है, तो उसके शरीर में उस बीमारी से लड़ने की स्वाभाविक प्रतिरोधक क्षमता बन जाती है। इसे प्राकृतिक टीकाकरण कहते हैं।
2. घर एवं बाहर बच्चों की वैकल्पिक देखरेख कैसी होनी चाहिए।
वैकल्पिक देखरेख का मतलब है – जब माता-पिता या परिवार किसी कारण से बच्चे की लगातार देखभाल नहीं कर पाते, तो उसकी देखभाल घर के अन्य सदस्य या बाहर किसी संस्था/समुदाय द्वारा की जाती है।
i. घर में बच्चों की वैकल्पिक देखरेख
बच्चों की देखभाल घर पर प्रायः दादा-दादी, नाना-नानी, चाचा-चाची या अन्य रिश्तेदार करते हैं।
सुरक्षित वातावरण – बच्चे को घर में प्यार, सुरक्षा और समय पर भोजन मिलना चाहिए।
शिक्षा और संस्कार – पढ़ाई और अच्छे संस्कार सिखाने पर ध्यान देना चाहिए।
स्वास्थ्य देखभाल – टीकाकरण, दवाइयाँ और साफ-सफाई का ध्यान रखना चाहिए।
भावनात्मक सहयोग – बच्चों से बातचीत करें, उन्हें प्यार दें ताकि वे अकेलापन महसूस न करें।
ii. घर से बाहर बच्चों की वैकल्पिक देखरेख
जब घर में देखभाल संभव न हो, तब बच्चे की देखभाल बाहर की व्यवस्थाओं से की जाती है।
डे-केयर सेंटर/आंगनबाड़ी – कामकाजी माता-पिता के बच्चों को दिन में देखभाल, खाना और प्रारंभिक शिक्षा दी जाती है।
फॉस्टर केयर (पालन-पोषण देखभाल) – बच्चे को अस्थायी रूप से किसी अन्य परिवार के पास रखा जाता है ताकि उसे परिवार जैसा वातावरण मिल सके।
आश्रय गृह/बाल गृह – अनाथ या असहाय बच्चों के लिए संस्थाएँ, जहाँ भोजन, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएँ मिलती हैं।
गोद लेना (Adoption) – यदि असली माता-पिता देखभाल न कर सकें, तो बच्चा स्थायी रूप से किसी और परिवार द्वारा गोद लिया जाता है।
3. अस्पताल के प्रसूति केन्द्र तथा घर पर प्रसव कराने के लाभ और हानियाँ
i. अस्पताल (प्रसूति केन्द्र) में प्रसव
लाभ (फायदे)– माँ और बच्चे की सुरक्षा अधिक होती है, क्योंकि डॉक्टर और नर्स तुरंत मदद करते हैं।
साफ-सफाई और स्वच्छता बेहतर रहती है, जिससे संक्रमण का खतरा कम होता है।
माँ और बच्चे को टीका, दवा और देखरेख समय पर मिलती है।
हानियाँ:- अस्पताल जाने में खर्च ज्यादा हो सकता है।
कभी-कभी भीड़भाड़ और लंबा इंतजार करना पड़ सकता है।
माँ को घर जैसा आराम और अपनापन महसूस नहीं होता।
ii. घर पर प्रसव:
लाभ (फायदे)– घर का वातावरण माँ के लिए आरामदायक और परिचित होता है।
परिवार के लोग पास रहते हैं, जिससे माँ को मानसिक सहारा मिलता है।
खर्च कम आता है।
हानियाँ– अगर प्रसव में कोई जटिलता हो जाए तो तुरंत इलाज नहीं मिल पाता।
दवाइयाँ और मेडिकल उपकरण उपलब्ध नहीं होते।
संक्रमण (infection) होने का खतरा ज्यादा रहता है।
माँ और बच्चे की जान को खतरा हो सकता है अगर सही समय पर मदद न मिले।
4. शिशु का प्रथम आहार दूध कैसा होना चाहिए? इसमें किन बातों को ध्यान में रखा जा सकता है?
उत्तर - जन्म के बाद शिशु के लिए सबसे अच्छा और पहला आहार माँ का दूध है। इसे ही प्रथम आहार कहा जाता है। यह शिशु को ताक़त, रोगों से बचाव और मानसिक विकास के लिए सबसे ज़रूरी पोषण देता है।
माँ के दूध की खास विशेषताएँ
i. पूर्ण आहार – इसमें प्रोटीन, वसा, विटामिन और खनिज सब कुछ पर्याप्त मात्रा में होता है सिर्फ विटामिन D की मात्रा कम होती है।
ii. कोलोस्ट्रम (पहला पीला दूध) – यह जन्म के बाद 2-3 दिन तक आता है। इसमें रोगों से लड़ने वाले तत्व होते हैं। यह बच्चे की आँत साफ करता है और उसे बीमारियों से बचाता है।
iii. आसानी से पचने वाला – शिशु का पेट छोटा और नाजुक होता है, माँ का दूध जल्दी पच जाता है।
iv. सुरक्षित और स्वच्छ – इसमें गंदगी या कीटाणु नहीं होते, इसलिए यह सबसे सुरक्षित है।
v. माँ-बच्चे का रिश्ता मजबूत बनाता है – स्तनपान से बच्चे को सुरक्षा और माँ को मानसिक संतोष मिलता है।
शिशु के आहार में ध्यान रखने योग्य बातें
जन्म से 6 महीने तक केवल माँ का दूध ही दें – न पानी, न शहद, न गाय/बकरी का दूध।
जन्म के 1 घंटे के भीतर दूध पिलाना चाहिए।
कोलोस्ट्रम कभी न फेंकें, यह बच्चे के लिए “पहला टीका” है।
स्तनपान से पहले माँ को हाथ और शरीर साफ रखना चाहिए।
माँ का भोजन अच्छा और संतुलित होना चाहिए, तभी दूध भी पोषक बनेगा।
माँ का मन शांत और प्रसन्न रहना चाहिए, इससे दूध का स्राव ठीक से होता है।
5. शिशु को दूध पिलाते समय किन-किन सावधानियों को रखना अत्यन्त आवश्यक है?
उत्तर -
i. दूध माँ का ही सबसे अच्छा है – जन्म के बाद 6 महीने तक शिशु को केवल माँ का दूध देना चाहिए। यह उसका पहला और संपूर्ण आहार है।
ii. साफ-सफाई का ध्यान – माँ को दूध पिलाने से पहले अपने हाथ और स्तन साफ करने चाहिए। गंदगी या संक्रमण से शिशु बीमार पड़ सकता है।
iii. सही स्थिति में दूध पिलाना – शिशु को गोद में लेकर उसका सिर थोड़ा ऊँचा रखें। मुँह और नाक खुला होना चाहिए ताकि उसे साँस लेने में दिक्कत न हो।
iv. समय पर और पर्याप्त दूध – शिशु को उसकी भूख के अनुसार बार-बार दूध पिलाना चाहिए। दूध पिलाने का कोई निश्चित समय नहीं, जब शिशु रोए या भूखा लगे तो दूध देना चाहिए।
v. बोतल का प्रयोग न करें – बोतल से दूध पिलाने पर संक्रमण और दस्त होने का खतरा रहता है। अगर माँ का दूध न मिले तो चम्मच या कप से दूध देना चाहिए।
vi. डकार दिलाना जरूरी है – दूध पीने के बाद शिशु को कंधे से लगाकर हल्का सहलाएँ ताकि उसे डकार आ जाए। इससे पेट में फँसी हवा निकल जाएगी और शिशु आराम से सो पाएगा।
vii. बाहरी चीजें न दें – जन्म के 6 महीने तक शिशु को शहद, घुट्टी, पानी या अन्य कोई भोजन न दें। केवल माँ का दूध ही पर्याप्त और सुरक्षित है।
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